आनुवंशिकता एवं जैव विकास
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आनुवंशिकता एवं जैव विकास-

1-आनुवंशिकी

जनन प्रक्रम का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम संतति के जीवों के समान डिजाइन (अभिकल्प) का होना है। आनुवंशिकता के नियम इस बात का निर्धारण करते हैं, जिनके द्वारा विभिन्न लक्षण पूर्व विश्वसनीयता के साथ वंशागत होते हैं।

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2-वंशागत लक्षण

वास्तव में समानता एवं विभिन्नताओं से हमारा क्या अभिप्राय है? हम जानते हैं कि शिशु में मानव के सभी आधारभूत लक्षण होते हैं। फिर भी यह पूर्णरूप से अपने जनकों जैसा दिखाई नहीं पड़ता तथा मानव समष्टि में यह विभिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है।

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3-लक्षणों की वंशागति के नियम

मानव में लक्षणों की वंशागति के नियम इस बात पर आधारित हैं कि माता एवं पिता, दोनों ही समान मात्रा में आनुवंशिक पदार्थ को संतति (शिशु) में स्थानांतरित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक लक्षण पिता और माता के डी.एन.ए. से प्रभावित हो सकता है। अत: प्रत्येक लक्षण के लिए, प्रत्येक संतति में दो विकल्प होंगे। फिर संतान में कौन-सा लक्षण परिलक्षित होगा? मेंडल ने इस प्रकार की वंशागति के कुछ मुख्य नियम प्रस्तुत किए। इन प्रयोगों के बारे में जानना अत्यंत रोचक होगा जो उसने लगभग एक शताब्दी से भी पहले किए थे।

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4-जैव विज्ञान का विकास

अभी तक हमने जो कुछ भी समझा, वह सूक्ष्म-विकास था। इसका अर्थ है कि यह परिवर्तन बहुत छोटे हैं, तथापि महत्वपूर्ण हैं। फिर भी ये विशिष्ट स्पीशीज की समष्टि के सामान्य लक्षणों (स्वरूप) में परिवर्तन लाते हैं,

लेकिन इससे यह नहीं समझा जा सकता कि नयी स्पीशीज (जाति) का उद्भव किस प्रकार होता है। यह तभी कहा जा सकता था, जबकि भृगों का यह समूह, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, दो भिन्न समष्टियों में बँट जाएँ तो आपस में जनन करने में असमर्थ हों। जब यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब हम उनहें दो स्वतंत्र स्पीशीज कह सकते हैं।

सोचिए, क्या होगा कि वे झाड़ियाँ जिन पर भृंग भोजन के लिए निर्भर करते हैं, एक पर्वतश्रृंखला के बृहद क्षेत्र में फैल जाएं। परिणामत: समष्टि का आकार भी विशाल हो जाता है। परंतु व्यष्टि भृंग अपने भोजन के लिए जीवन-भर अपने आसपास की कुछ झाड़ियों पर ही निर्भर करते हैं।

वे बहुत दूर नहीं जा सकते। अत: भूगों की इस विशाल समष्टि के आसपास उप-समष्टि होगी। क्योंकि नर एवं मादा भृंग जनन के लिए आवश्यक हैं। अत: जनन प्राय: इन उप समष्टियों के सदस्यों के मध्य ही होगा।

हाँ, कुछ साहसी भृंग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं अथवा कौआ एक भृंग को एक स्थान से उठाकर बिना हानि पहुँचाए दूसरे स्थान पर छोड़ देता है। दोनों ही स्थितियों में अप्रवासी भृंग, स्थानीय समष्टि के साथ ही जनन करेगा। परिणामत: अप्रवासी भृंग के जीन नयी समष्टि में प्रविष्ट हो जाएँगे।

इस प्रकार जीन-प्रवाह उन समष्टियों में होता रहता है, जो आंशिक रूप से अलग-अलग हैं; परंतु पूर्णरूपेण अलग नहीं हुई हैं। परंतु, यदि इस प्रकार की दो उप समष्टियों के मध्य एक विशाल नदी आ जाए, तो दोनों समष्टियाँ और अधिक पृथक हो जाएँगी। दोनों के मध्य जीन-प्रवाह का स्तर और भी कम हो जाएगा।

5-जीवाश्म

अंगों की संरचना केवल वर्तमान स्पीशीज पर ही नहीं की जा सकती, वरन् उन स्पीशीज पर भी की जा सकती है जो अब जीवित नहीं हैं। हम कैसे जान पाते हैं कि ये विलुप्त स्पीशीज कभी अस्तित्व में भी थीं? यह हम जीवाश्म द्वारा ही जान पाते हैं। जीवाश्म क्या हैं?

सामान्यतः जीव की मृत्यु के बाद उसके शरीर का अपघटन हो जाता है तथा वह समाप्त हो जाता है। परंतु कभी-कभी जीव अथवा उसके कुछ भाग ऐसे वातावरण में चले जाते हैं, जिसके कारण इनका अपघटन पूरी तरह से नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए, यदि कोई मृत कीट गर्म मिट्टी में सूख कर कठोर हो जाए तथा उसमें कीट के शरीर की छाप सुरक्षित रह जाए। जीव के इस प्रकार के परिरक्षित अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं।

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6-महत्वपूर्ण प्रश्न-

प्रश्न 1. यदि एक ‘लक्षण-A’ अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि के 10 प्रतिशत सदस्यों में पाया जाता है तथा ‘लक्षण-B’ उसी समष्टि में 60 प्रतिशत जीवों में पाया जाता है, तो कौन-सा लक्षण पहले उत्पन्न होगा?

उत्तर- लक्षण-B’ अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि में 60 प्रतिशत जीवों में पाया जाता है जो ‘लक्षण-A’ प्रजनन वाली समष्टि से 50% अधिक है इसलिए ‘लक्षण-B’ पहले उत्पन्न हुआ होगा।

प्रश्न 2. विभिन्नताओं के उत्पन्न होने से किसी स्पीशीज़ की उत्तरजीविता की संभावना क्यों बढ़ जाती है?

उत्तर-विभिन्नताओं के उत्पन्न होने से किसी स्पीशीज़ की उत्तरजीविता की संभावना बढ़ जाती है। प्राकृतिक चयन ही किसी स्पीशीज़ की उत्तरजीविता का आधार बनता है जो वातावरण में घटित होता है। समय के साथ उनमें जो प्रगति की प्रवृत्ति दिखाई देती है उसके साथ उन के शारीरिक अधिकल्प में जटिलता की वृद्धि भी हो जाती है। ऊष्णता को सहन करने की क्षमता वाले जीवाणुओं की अधिक गर्मी में बचने की संभावना अधिक होती है। पर्यावरण द्वारा उत्तम परिवर्तन का चयन जैव विकास प्रक्रम का आधार बनता है।

प्रश्न 1. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण (Traits) प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?

उत्तर-जब मेंडल ने मटर के लंबे पौधे और बौने पौधे का संकरण कराया तो उसे प्रथम संतति पीढ़ी F1 में सभी पौधे लंबे प्राप्त हुए थे। इस का अर्थ था कि दो लक्षणों में से केवल एक पैतृक लक्षण ही दिखाई दिया। उन दोनों का मिश्रित प्रमाण दिखाई नहीं दिया। उसने पैतृक पौधों और F1 पीढ़ी के पौधों को स्वपरागण से उगाया। इस दूसरी पीढ़ी F2 में सभी पौधे लंबे नहीं थे। इसमें एक चौथाई पौधे बौने थे। मेंडल ने लंबे पौधों के लक्षण को प्रभावी और बौने पौधों के लक्षण को अप्रभावी कहा।

प्रश्न 4. मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है?

उत्तर-मानवों में लिंग का निर्धारण विशेष लिंग गुण सत्रों के आधार पर होता है। नर में XY गुण सूत्र होते हैं और मादा में XX गुण सूत्र विद्यमान होते हैं। इससे स्पष्ट है कि मादा के पास Y गुण सूत्र होता ही नहीं है। जब नर-मादा के संयोग से संतान उत्पन्न होती है तो मादा किसी भी अवस्था में नर शिशु को उत्पन्न करने में समर्थ हो ही नहीं सकती क्योंकि नर शिशु में XY गुण सूत्र होने चाहिएँ।

निषेचन क्रिया में यदि पुरुष का X लिंग गुण सूत्र स्त्री के X लिंग गुणसूत्र से मिलता है तो इससे XX जोड़ा बनेगा अत: संतान लड़की के रूप में होगी लेकिन जब पुरुष का Y लिंग गुण सूत्र स्त्री के लिंग गुण सूत्र से मिलकर निषेचन करेगा तो XY बनेगा। इससे लड़के का जन्म होगा। किसी भी परिवार में लड़के या लड़की का जन्म पुरुष के गुण सूत्रों पर निर्भर करता है क्योंकि Y गुण सूत्र को तो केवल उसी के पास होता है।

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