जाति धर्म और लैंगिक मसले-

जाति धर्म और लैंगिक मसले-

1-श्रम का लैंगिक विभाजन

लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन एक ऐसा कड़वा सच है जो हमारे घरों और समाज में आज भी दिखाई देता है। अधिकांश घरों में चूल्हा-चौका और साफ सफाई के काम महिलाओं द्वारा या उनकी देखरेख में नौकरों द्वारा किये जाते हैं। घर के बाहर के काम पुरुषों द्वारा किये जाते हैं। सार्वजनिक जीवन पर अक्सर पुरुषों का वर्चस्व रहता है। महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर ही सिमट कर रहना पड़ता है।

नारीवादी आंदोलन: जो आंदोलन महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से किये जाते हैं उन्हें नारीवादी आंदोलन कहते हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में लैंगिक मसलों को लेकर राजनैतिक गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। इससे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। भारत का समाज एक पितृ प्रधान समाज है। फिर भी आज महिलाएँ कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं।

जाति धर्म और लैंगिक मसले-
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2-महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व

भारतीय राजनीति में कई महिलाएँ प्रखर राजनेता हैं, लेकिन राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत ही खराब है। विधायिकाओं और मंत्रीमंडल में महिलाओं की संख्या बहुत कम है।

इस स्थिति को सुधारने के लिये स्थानीय स्वशासी निकायों की एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिये आरक्षित रखा गया है। लेकिन संसद और विधानसभाओं में अभी तक महिलाओं को आरक्षण नहीं मिल पाया है।

3-जाति पर आधारित पूर्वाग्रह:

  • भारतीय समाज में आज भी जाति पर आधारित पूर्वाग्रह देखने को मिलते हैं। ग्रामीण इलाकों में आज भी नीची जाति के लोगों को ऊँची जाति के सामाजिक या धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की अनुमति नहीं मिलती है। ऊँची जाति के कई लोग तो दलितों की छाया से भी परहेज करते हैं।
  • लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हुए हैं जिनके कारण जातिगत विभाजन कमजोर पड़ते जा रहे हैं। आर्थिक विकास, तेजी से होता शहरीकरण, साक्षरता, पेशा चुनने की आजादी और जमींदारों की कमजोर होती स्थिति की इसमें बड़ी भूमिका रही है।
  • अभी भी शादियाँ तय करने में जाति एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है। आप किसी भी अखबार के वैवाहिक विज्ञापन को देख लीजिए। उन विज्ञापनों में जाति पर आधारित समूह दिखाई देंगे। लेकिन जीवन के अन्य मामलों में जाति का प्रभाव खत्म होता दिख रहा है।
  • ऊँची जाति के लोगों को सदियों से शिक्षा के बेहतर अवसर मिलने के कारण ऊँची जाति के लोगों ने आर्थिक रूप से अधिक तरक्की की। आज भी पिछड़ी जाति के लोग सामाजिक और आर्थिक विकास में पीछे चल रहे हैं।
जाति धर्म और लैंगिक मसले-
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4-राजनीति में जाति

  • भारतीय राजनीति में भी जाति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ज्यादातर चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का चयन उस क्षेत्र की जातीय समीकरण के आधार पर होता है।
  • हर जाति के लोग राजनैतिक सत्ता में अपनी भागीदारी लेने के लिये अपनी जातिगत पहचान को अपने-अपने तरीके से व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। कई जातियों ने मिलकर अपना गठबंधन भी बनाया है ताकि वे अच्छे तरीके से राजनैतिक मोलभाव कर सकें।
  • जाति समूहों को मुख्य रूप से ‘अगड़े’ और ‘पिछड़े’ वर्गों में बाँटा जा सकता है।
  • लेकिन जातिगत विभाजन से अकसर समाज में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है और हिंसा भी हो सकती है।

5-जातिगत असामनता

अभी भी जाति के आधार पर आर्थिक विषमता देखने को मिलती है। उँची जाति के लोग सामन्यतया संपन्न होते है। पिछड़ी जाति के लोग बीच में आते हैं, और दलित तथा आदिवासी सबसे नीचे आते हैं। सबसे निम्न जातियों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है। नीचे दिये गये टेबल से यह बात साफ हो जाती है।

6-नारीवादी आंदोलन:

महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के उद्देश्य से होने वाले आंदोलन को नारीवादी आंदोलन कहते हैं।हाल के वर्षों में लैंगिक मसलों को लेकर राजनैतिक गतिविधियों के कारण सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्थिति काफी सुधर गई है। भारत का समाज एक पितृ प्रधान समाज है।

इसके बावजूद आज महिलाएँ कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं।महिलाओं को अभी भी कई तरह के भेदभावों का सामना करना पड़ता है। इसके कुछ उदाहरण नीचे दिये गये हैं:पुरुषों में 76% के मुकाबले महिलाओं में साक्षरता दर केवल 54% है।ऊँचे पदों पर महिलाओं की संख्या काफी कम है। कई मामलों में ये भी देखा गया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम वेतन मिलता है।

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जबकि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ प्रतिदिन अधिक घंटे काम करती हैं।आज भी अधिकाँश परिवारों में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को अधिक प्रश्रय दिया जाता है। ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं जिसमें कन्या को भ्रूण अवस्था में ही मार दिया जाता है।

भारत का लिंग अनुपात महिलाओं के पक्ष में दूर दूर तक नहीं है।महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के कई मामले सामने आते हैं और ये घटनाएँ घर में और घर के बाहर भी होती हैं

जाति धर्म और लैंगिक मसले-
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7-महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर-

प्रश्न 1. नारीवादी आंदोलन क्या थे?

उत्तर- वह आंदोलन जो स्त्रियों को पुरुषों के समान एक जैसी स्थिति दिलाने के लिए चलाए गए थे, उन्हें नारीवादी आंदोलन कहा जाता है। इसका अर्थ है कि वह महिला आंदोलन नारीवादी आंदोलन होते हैं जिनका उद्देश्य व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन में लैंगिक समानता प्राप्त करना था।

प्रश्न 2. हमारे देश में स्त्रियाँ पुरुषों से इतना पीछे क्यों हैं?

उत्तर- भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियाँ पुरुषों से इतना पीछे हैं क्योंकि हमारा समाज पितृसत्तात्मक समाज है तथा स्त्रियों को बहुत सी निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता है, जैसे कि पढ़ाई के कम अवसर, कम आर्थिक अवसर इत्यादि। इसलिए ही वे पुरुषों से पीछे हैं।

प्रश्न 3. पितृसत्तात्मक समाज कौन-सा होता है?

उत्तर- पितृसत्तात्मक समाज वह होता है जो संपूर्णतया पुरुष प्रधान होता है तथा परिवार का मुखिया पिता होता है। परिवार के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय पिता द्वारा लिए जाते हैं।

प्रश्न 4. पारिवारिक कानूनों का क्या अर्थ है?

उत्तर- पारिवारिक कानून वे कानून हैं जो पारिवारिक मसलों तथा झगड़ों को हल करने के लिए बने हों जैसे कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना आदि। यह कानून अलग-अलग धर्मों के लिए अलग हैं तथा केवल पारिवारिक मुददों से संबंधित हैं। :

प्रश्न 5. सांप्रदायिकता का क्या अर्थ है?

उत्तर- सांप्रदायिकता एक विचारधारा है जो जनता में एक धर्म के धार्मिक विचारों का प्रचार करने का प्रयास करता है तथा यह धार्मिक विचार और धार्मिक समूहों के धार्मिक विचारों से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं।

प्रश्न 6. भारत में जाति ने किन तरीकों से राजनीति को प्रभावित किया है?

उत्तर- (क) भिन्न-भिन्न जातियों के नेता चुनाव लड़ते हैं तथा चुनाव जीतने के लिए जाति के सदस्यों की वफादारी जीतने का प्रयास करते हैं।
(ख) भिन्न-भिन्न जातियाँ एक-दूसरे के नज़दीक आकर गठबंधन बना लेती हैं ताकि वह नेताओं से अपने लिए अधिक-से-अधिक सुविधाओं की माँग कर सकें।

प्रश्न 7. संविधान निर्माता भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य क्यों बनाना चाहते थे?

उत्तर- संविधान निर्माता भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे क्योंकि उन्हें सांप्रदायिकता का भय था। भारत में बहुत-से धर्म पाए जाते हैं तथा वह चाहते थे कि किसी भी धर्म को दूसरे धर्म से अधिक महत्त्व न दिया जाए। सभी धर्मों को समान महत्त्व दिए जाए ताकि समाज में सांप्रदायिक दंगे न भड़कें।

प्रश्न 8. लैंगिक विभाजन किस पर आधारित है?

उत्तर- लैंगिक विभाजन स्त्री-पुरुष की प्रचलित रूढ़ छवियों और सामाजिक अपेक्षाओं पर आधारित है।

प्रश्न 9. नारीवादी पुरुष अथवा स्त्री कौन है?

उत्तर- नारीवादी पुरुष अथवा स्त्री वह है जो पुरुष तथा स्त्री के समान अधिकार में विश्वास करता है।

प्रश्न 10. कौन-से दो देशों में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहत अधिक है?

उत्तर- (क) अमरीका (उत्तरी और दक्षिणी) (ख) नार्डिक देश (डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे और स्वीडन)

प्रश्न 11. 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या के अनुपात को क्या कहते हैं?

उत्तर- लिंग अनुपात।

प्रश्न 12. स्थानिक स्व-सरकार में महिलाओं के लिए कितने स्थान आरक्षित हैं?

उत्तर- स्थानीय स्व-सरकार में 1/3 स्थान स्त्रियों के लिए आरक्षित हैं।

प्रश्न 13. विवाह, तलाक, उत्तराधिकार इत्यादि से संबंधित कानूनों को क्या कहते हैं?

उत्तर- पारिवारिक कानून ।

प्रश्न 14. धर्म को राजनीति में प्रयोग करने को क्या कहते हैं?

उत्तर- सांप्रदायिक हिंसा।।

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