भारत में राष्ट्रवाद
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भारत में राष्ट्रवाद

1-राष्ट्रवाद उदय के कारण

भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन तथा राष्ट्रवाद का उदय अनेक कारणों तथा परिस्थितियों का परिणाम था, जिन्हें निम्न रूपों में देखा जा सकता है –

ब्रिटिश शासन ने भारतीय ग्रामीण उद्योग और कृषि को नष्ट कर दिया था और ग्रामीण अर्थव्यस्था को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदल कर रख दिया था. इसके परिणामस्वरूप लोगों ब्रिटिश शासन प्रति आक्रोश की भावना का उदय हुआ.

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ब्रिटिश शासन द्वारा अपने हितों की पूर्ति के उद्देश्य से किया गया रेलवे का विस्तार तथा डाक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के चलते देश के विभिन्न भागों में रह रहे लोगों और नेताओं के मध्य संपर्क संभव हो गया जिससे राष्ट्रवाद को बल मिला.     

2-भारतीय पुनर्जागरण-

भारतीय पुनर्जागरण ने भी अपने दो स्वरूपों में राष्ट्रवाद की भावना को प्रश्रय दिया. पहला, उसने भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों, अनैतिकताओं, अवांछनीयताओं एवं रूढ़ियों मुक्ति का मार्ग दिखाया और दूसरा, श्वेतों के अधिभार (White Man’s Burden Theory) के विपरीत भारतीय संस्कृति के गौरव को पुनर्स्थापित किया. इसके परिणामस्वरूप देश में एक नवीन राष्ट्रीय चेतना की भावना को बल मिला. डलहौजी के कार्यकाल में रेलवे, टेलीग्राफी और आधुनिक डाक व्यवस्था आदि के विकास से भारत की परिवहन एवं संचार व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया था. वैसे इन बदलावों के पीछे अंग्रेजों के औपनिवेशिक हित ही छिपे थे.

1857 में मंगल पांडेय ने स्वतंत्रता के लिए जिस संग्राम का शंखनाद किया, उसकी पृष्ठभूमि वस्तुतः बहुत पहले तैयार होना शुरू हो गई थी। स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रवादी इतिहास में उसका उल्लेख नाम मात्र ही किया जाता है।

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भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध दो प्रकार के आंदोलन चले- अहिंसक और क्रांतिकारी। भारत की आजादी के लिए 1757 से 1942 के बीच जितने भी आंदोलन, विद्रोह हुए वे सभी पूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बने।


इतिहास के सूक्ष्म अध्ययन से ही उस कालखंड पर दृष्टिपात होता है। इससे पहले कि हम उन तत्वों और घटनाओं का शाब्दिक चित्रण करें, भारत में राष्ट्रवाद की प्रमुख घटनाओं की महत्ता को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
देखा जाए तो एक प्रकार से 1941 से 1918 तक चलने वाले प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गांधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। असहयोग आंदोलन, नागरिक अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन उनके नेतृत्व में चलने वाली प्रमुख घटनाएं थीं।

राष्ट्रीय आंदोलन में 13 अप्रैल, 1919 के दिन पंजाब के अमृतसर में जलियांवाला बाग की दु:खद घटना ने राष्ट्रवादी भावना को उद्वेलित करने में विशेष भूमिका निभाई। 1919 में अंग्रेजों के विरुद्ध चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन में अली बन्धुओं ने तब मोर्चा खोल दिया जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की से हुए अन्याय का विरोध किया। इस विरोध को ही खिलाफ़त आंदोलन कहा जाता है।

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1927 में ब्रिटिश सरकार ने जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग नियुक्त किया जिसका कार्य 1919 के विधेयक का पुनर्रावलोकन करना था। यह आयोग तीन फरवरी, 1928 को भारत पहुंचा, जिसका भारतीयों ने इसलिए विरोध किया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था।
चूंकि भारतीयों ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार की सहायता की थी, अत: आशा यह थी कि अंग्रेजी शासन भारतीयों को विशेषाधिकार देकर प्रसन्न करेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गांधी जी के नेतृत्व में लोगों ने इसका जम कर विरोध किया और समूचे देश में असंतोष फैल गया।

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अंग्रेज़ भयभीत हो गए और उन्होंने 1919 में दमनकारी रौलट्ट एक्ट पारित कर दिया। पहली बार भारतीयों ने धार्मिक पहचान को दरकिनार करते हुए बतौर भारतवासी ब्रिटिश सरकार के इस काले कानून का विरोध किया। इसके पश्चात 1921 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया लेकिन उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा गांव में हई हिंसक घटना के कारण गांधी जी ने इसे वापिस ले लिया और सत्याग्रह शुरू कर दिया।


1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का सत्र लाहौर में हुआ, जिसमें संपूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया गया। उधर ब्रिटिश सरकार ने नवम्बर 1930 को पहली गोल मेज़ कान्फ्रेंस बुलाई ताकि साइमन कमीशन द्वारा प्रस्तावित सुधारों को कोई शक्ल दी जा सके। कांग्रेस का इस कान्फ्रेंस का बहिष्कार किया। 1932 में लार्ड इरविन गांधी जी को अवज्ञा आंदोलन को समाप्त करने और दूसरी गोल मेज़ कान्फ्रेंस में भाग लेने के लिए राजी कर लिया। गांधी इसमें शामिल हुए मगर कुछ भी प्राप्त नहीं कर सके।

साइमन कमीशन का सिफारिशों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने 1935 में एक एक्ट पास किया जिसमें प्रांतीय स्तर पर निर्वाचित सरकारें गठिया करने का प्रावधान था। इसके अंतर्गत 1937 में देश के ग्यारह प्रांतों में चुनाव हुए। कांग्रेस ने सात प्रांतों में बहुमत प्राप्त किया। इस बीच 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस से मशविरा किए बिना भारत को युद्ध में भागीदार घोषित कर दिया। विरोध स्वरूप कांग्रेस के समस्त मंत्रियों ने नवम्बर 1939 में त्यागपत्र दे दिया।
तो हम ने देखा कि भारतीयों का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच कई कानून बनाये। अन्ततः 15 अगस्त, 1947 को भारत ने अंग्रेजी राज से स्वतंत्रता पाई।

3-इस पाठ के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न-

1-सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है।

उत्तर-सत्याग्रह आंदोलन की एक नवीन पद्धति थी सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आगरा और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था इसका अर्थ यह था कि अगर आपका उद्देश्यय सच्चा है यदि आप का संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है । तो उत्पीड़क से मुकाबला करनेे के लिए आपको किसी शारीरिक बल्कि आवश्यकता नहीं है केवल अहिंसा द्वारा अपने संघर्ष मे सफल हो सकताा है।

2-गांधी जी की डाण्डी यात्रा।

12 मार्च 1930 को गांधी जी ने नमक विरोधी कानून के विरोध में दांडी मार्च अर्थात् दांडी यात्रा निकाली थी। यह यात्रा अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गांव दांडी तक 78 व्यक्तियों के साथ पैदल निकाली गई।

इसे नमक मार्च और दांडी सत्याग्रह भी कहा जाता है। यह अंग्रेजों द्वारा लागू नमक कानून के विरुद्ध सविनय कानून को भंग करने का कार्यक्रम था। अंग्रेजी शासन में नमक का उत्पादन और विक्रय करने पर भारी कर लगा दिया था। नमक जीवन के लिए आवश्यक वस्तु होने से इस कर को हटाने के लिये गांधी जी ने यह सत्याग्रह चलाया।

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