Ncrt Class 10 मृदा संसाधन एवं विकास (पाठ-1)

मृदा संसाधन भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय

मृदा संसाधन– एक कैसा संसाधन है जिसका उपयोग हमारे पूर्वज करते आए हैं तथा भावी पीढ़ी भी इसी भूमि का यूज(Use) करेगी। हम भोजन, मकान और कपड़े की अपनी मूल आवश्यकताओं का 95% भाग भूमि से प्राप्त करते हैं। मानव कार्यकलापों(Activities) के कारण न केवल भूमि का नवीकरण (Renewal) हो रहा है बल्कि भूमि को नुकसान पहुंचाने वाली नेचर (Nature) ताकतों को भी बल मिला है।

इस समय भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि नवीक्रत है। इसमें से लगभग 28% भूमि निम्नीक्रत वनो के अंतर्गत है, 56 क्षेत्र जल अपरदित हैं और इस क्षेत्र लवणीय और क्षारीय है। कुछ मानव क्रियाओ जैसे वनॉन्मुलान, अति पशुचारण, खनन ने भी भूमि के निम्नीकरण के मेन(Main) भूमिका निभाई है।

मृदाएं

खनन के उपरांत खदानों(Mines) वाले स्थानों को गहरी खाईओ और मलबे के साथ खुला(open) छोड़ दिया जाता है। खनन के कारण झारखंड(JKh), छत्तीसगढ़(C.G), मध्य प्रदेश(M.P) और उड़ीसा जैसे स्टेट (state) में वनोन्मूलन भूमि निम्नीकरण का कारण बना है। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में अति पशुचारण भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधिक सिंचाई(Irrigation) भूमि(earth) निम्नीकरण के लिए उत्तरदाई है।

अति सिंचन से उत्पन्न(Generated) जलाक्रांतता भी भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदाई है जिससे मृदा(Soil) में लवणीयता और क्षारीयता बड जाती है। खनिज प्रक्रियाए जैसे सीमेंट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना और मृदा बर्तन उद्योग में चूने (खड़िया मृदा) और सेलखड़ी के एक्सपेरिमेंट (experiment) से बहुत अधिक मात्रा में वायुमंडल में धूल विसर्जित होती है। जब इसकी परत भूमि पर जम(Solid) जाती है तो मृदा(Soil) की जल सोखने(Soak) की प्रक्रिया अवरुद्ध(Blocked) हो जाती है।

पिछले कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में इंडस्ट्रियल (Industrial) जल विकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत है। भूमि निम्नीकरण की प्रॉब्लम्स(Problems) को सुलझाने के कई तरीके हैं। वनारोपण और चारागाहो का उचित प्रबंधन इसमें कुछ हद तक हेल्प(Help) कर सकते हैं।

पेड़ों की रक्षक मेखला (Shelter belt), पशुचारण नियंत्रण और रेतीले टीलों को कांटेदार झाड़ियां लगाकर स्थिर बनाने की प्रक्रिया से भी भूमि कटाव की रोकथाम शुष्क क्षेत्रों में की जा सकती है। बंजर भूमि के उचित प्रबंधन, खनन नियंत्रण और औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात विसर्जित करके वाटर(Water) और भूमि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

मृदा संसाधन

मिट्टी अथवा मृदा सबसे इंपॉर्टेंट(Important) नवीकरण योग्य प्राकृतिक मृदा संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है जो पृथ्वी(Earth) पर विभिन्न प्रकार के जीवो का पोषण करती है। मृदा एक जीवित तंत्र है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा मरने में लाखो वर्ष(Year) लग जाते हैं।

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मृदा बनने की प्रक्रिया में उच्चावत, जनक शैल अथवा संस्तर शेल, जलवायु, वनस्पति और अन्य जैव मटेरियल (material) और समय मुख्य कारक है। प्रकृति के अनेकों तत्व जैसे टेंपरेचर(Temperature) परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन क्रियाए आदि मृदा बनने की प्रक्रिया में योगदान देती है। मृदा संसाधन में होने वाले केमिकल(Chemical) और जैविक परिवर्तन भी महत्वपूर्ण है। मृदा जैव और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थ से बनती है। मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले तत्वों, उनके रंग, गहराई, गठन, आयु, केमिकल(Chemical) और भौतिक गुणों के आधार पर भारत(India) की मृदाओ(Soil) के निम्नलिखित प्रकार है।

मृदाओ का वर्गीकरण

भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच भू-आकृतियां, जलवायु और वनस्पतियां पाई जाती है। इस कारण अनेक प्रकार की मृदाए डेवलप्ड(Developed) हुई है।

जलोढ़ मृदा

जलोढ़ मृदा(Alluvial soil) संसाधन विस्तृत रूप से फैली हुई है और यह देश की महत्वपूर्ण मृदा है। वास्तव में संपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा(Alluvial soil) से बना है। यह मृदा हिमालय(Himalaya) की तीन इंपॉर्टेंट (Important) नदी तंत्रों सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है। एक संकरे गलियारे के द्वारा यह मृदाए राजस्थान(Rajasthan) और गुजरात(Gujarat) तक फैली है। पूर्वी तटीय मैदान, विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा(Krishna), और कावेरी रिवर(River) के डेल्ट भी जलोढ़ मृदा से बने हैं।

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मृदा(soil) में रेत, सिल्ट(Silt) और मृतिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। जैसे हम नदी(River) के मुहाने से घाटी में ऊपर की ओर जाते हैं मृदा के कणों(Particles) का आकार(Size) बढ़ता चला जाता है। नदी घाटी के ऊपरी भाग में, जैसे ढाल भांग के समीप मोटे कड़वाली मृदाए पाई जाती है। ऐसी मृदाए पर्वतों की तलहटी पर बने मैदानो जैसे क्षेत्र और तराई में आमतौर पर पाई जाती है। कणों के आकार या घटकों के अलावा मृदाओं की पहचान उनकी एज(Age) से भी होती है।

आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाए दो प्रकार की होती है पुराना जलोढ़ और नया जलोढ़ बांगर मृदा(Soil) में कंकर ग्रंथियों की मात्रा ज्यादा होती है। खादर मृदा में मृदा की तुलना में ज्यादा महीन कड़ पाए जाते हैं। जलोढ़ मृदाए बहुत उपजाऊ होती है। अधिकतर जलोढ़ मृदा में पोटाश फास्फोरस और चूना युक्त होती हैं जो इनको गन्ने, चावल, गेहूं और अन्य अनाजों और दलहन फसलों की फार्मिंग(Farming) के लिए उपयुक्त बनाती है अधिक उपजाऊ के कारण जलोढ़ मृदा वाला क्षेत्र में गहन कृषि की जाती है और यहां जनसंख्या घनत्व अधिक है क्षेत्र की अधिकारी होती है। सूखे एरिया (Area) की मृदाएं अधिक क्षारीय होती हैं। इन मृदाओं का सही उपचार और सिंचाई करके उनकी पैदावार बढ़ाई जा सकती है।

काली मृदा

इन मृदाओं का रंग ब्लैक(Black) है और इन्हें ‘रेगर’ म्रदाएं भी कहा जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए उचित समझी जाती है और काली कपास मृदा(Soil) के नाम से भी जाना जाता है। यह माना जाता है कि जलवायु और जनक शेलो ने ब्लैक(Black) मृदा के बनने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस प्रकार की मृदाए दक्कन पठार (बेसाल्ट) एरिया (Area) के उत्तर पश्चिमी भाग में पाई जाती हैं और लावा जनक शेलो से बनी है।

यह मृदाएं(Soil) महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती है और दक्षिणी पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा(Krishna) नदियों की घाटियों तक फैली है। काली मृदा बहुत महीन कणों अर्थात मृतिका से बनी है इनकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती है इसके अलावा यह मृदाए कैल्शियम कार्बोनेट(CaCO3), मैग्नीशियम, पोटाश, और चूने जैसे पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण होती है। परंतु इनमें फास्फोरस(H3 P O4) की मात्रा कम होती है।

गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदा(Soil) में गहरी दरारें पड़ जाती है जिससे इनमें अच्छी तरह वायू मिश्रण हो जाता है। गीली होने पर ये मृदाएं चिपचिपी हो जाती है और इनको जोतना डिफिकल्ट(Difficult) होता है। इसलिए, इसकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू कर दी जाती है।

लाल और पीली मृदा

लाल मृदा(Red Soil) दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में विकसित हुई है। लाल और पीली मृदाए(Yellow Soil) ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पर पाई जाती है। इन मृदाओं(Soiles) का लाल रंग रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण होता है। इनका पीला कलर(Colour) इनमें जलयोजन के कारण होता है।

लैटेराइट मृदा

लैटेराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द लेटर (Latter) से लिया गया है जिसका अर्थ है ईट।लैटेराइट मृदा का निर्माण उष्णकटिबंधीय तथा उपोषण कटिबंधिय जलवायु क्षेत्रों में आद्र तथा शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने के कारण होता है। यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (Leaching) का परिणाम है।

मृदा(Soil) अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0) होती है। इसमें सामान्यतः पौधों के पोषक तत्वों की कमी होती है। यह अधिकतर दक्षिणी स्टेट(state), महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट एरिया(Area), ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भागों तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में पाई जाती है। जहा इस मिट्टी(Soil) में पड़पाती और सदाबहार वन मिलते हैं, वहां इनमें हारमस पर्याप्त रूप से पाया जाता है, लेकिन विरल वनस्पति(Vegetation) और अर्थ शुष्क

पर्यावरण(Nature) में इस में हारमस की मात्रा कम पाई जाती है। स्थलरूपों पर उनकी स्थिति के अनुसार उनमें अपरदन तथा भूमि- निम्नीकरण की संभावना होती है। मृदा प्रोटेक्शन(Protection) की उचित टेक्नोलॉजी (Technology) अपनाकर इन मृदाओं पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफी उगाई जाती है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल(Red) लैटेराइट मृदाए काजू की फसल के लिए अधिक उपयुक्त है।

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