Ncrt Class 10 वन और वन्य जीवन संसाधन

वन व वन्य जीव (creatures) संसाधन के प्रकार और वितरण

यदि हम वन्य और वन जीवन संसाधन(Resources) को सुरक्षित करने चाहें, तो उनका प्रबंधन, नियंत्रण और विनिमयन(Exchange) अपेक्षाकृत कठिन है। भारत में अधिकतर वन जीवन संसाधन और वन्य या तो प्रत्यक्ष रूप से गवर्नमेंट(Government) के अधिकार क्षेत्र में है या वन विभाग अथवा अन्य विभागों के जरिए गवर्नमेंट (Government) के प्रबंधन में है। इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बांटा गया है-

(क) आरक्षित वन– देश में आधे से अधिक वन एरिया(Area) आरक्षित वन घोषित किए गए हैं। जहां तक वन जीवन संसाधन(Resources) और वन्य प्राणियों के प्रोटेक्शन (Protection) की बात है, आरक्षित वनों को सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है।

(ब) रक्षित वन– वन विभाग के अनुसार देश के कुल वन एरिया(Area) का एक-तिहाई हिस्सा रक्षित है। इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इनकी सिक्योरिटी (Security) की जाती है।

(ग) अवग्रिक्रत वन– अन्य सभी प्रकार के वन जीवन संसाधन और बंजर भूमि जो गवर्नमेंट(Government), व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवग्रिक्रत(Undeclared) वन कहे जाते हैं।

आरक्षित और रक्षित वन ऐसे स्थाई वन एरिया(Area) है जिनका रखरखाव इमारती लकड़ी, अन्य वन पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है। मन मध्यप्रदेश(M.P.) में स्थाई वनों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र है जो कि प्रदेश के कुल वन एरिया(Area) का भी 75% है। इसके अतिरिक्त जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी कुल वनों में एक बड़ा अनुपात रिजर्व(Reserve) वनों का है। जबकि बिहार, हरियाणा(H.R), पंजाब, हिमाचल प्रदेश(H.P.), ओडिशा और राजस्थान में कुल वन जीवन संसाधन में प्रोटेक्टेड (Protected) वनों का एक बड़ा अनुपात है। पूर्वोत्तर के सभी स्टेट(state) में और गुजरात(Gujrat) में अधिकतर वन एरिया(Area) अवग्रिक्रत वन है तथा स्थानीय समुदायों (community) के प्रबंधन में है।

समुदाय और वन संरक्षण

वन संरक्षण की नीतियां हमारे कंट्री(Country) में कोई नई बात नहीं है। हम आमतौर पर इस बात से अनजान है कि वन हमारे कंट्री(Country) में कुछ मानव प्रजातियों के आवास भी है। भारत के कुछ एरिया(Area) में तो स्थानीय समुदाय सरकारी सर अधिकारियों के साथ मिलकर अपने आवास स्थलों के संरक्षण में जुटे हैं क्योंकि इसी से ही दीर्घकाल में उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। सरिस्का बाघ रिजर्व(Reserve) में राजस्थान के विलेज(Village) के लोग वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत वहां से खनन कार्य बंद करवाने के लिए संघर्षरत हैं।

वन एवं वन्य जीवन संसाधन एनसीआरटी कक्षा-10, पाठ-2

कई एरिया(Area) में तो लोग स्वयं वन्यजीव आवासों(Residences) की रक्षा कर रहे हैं और सरकार की ओर से हस्तक्षेप भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं। राजस्थान के अलवर जिले में 5 विलेज(Village) के लोगों ने तो 1,200 भूमि भैरोदेव डाकव (Sentuary) घोषित कर दी जिसके अपने ही नियम कानून है जो शिकार वर्जित करते हैं तथा बाहरी लोगों की घुसपैठ(Infiltration) से यहां के वन्य जीवन को बचाते हैं।

पवित्र ट्री(Tree) के झुर मट(Wrinkle) विविध और दुर्लभ(rare) जातियों की संपत्ति

प्रकृति की पूजा सदियों पुराना जनजाति विश्वास है, जिसका आधार प्रकृति के हर रूप की रक्षा करना है। इन्हीं विश्वासों ने विभिन्न वनों को मूल एवं कोमार्य रूप में बचाकर रखा है। जिन्हें पवित्र पेड़ों(tree) के झुरमुट (देवी देवताओं के वन) कहते हैं। वनों के इन भागों में या तो वनों के ऐसे बड़े भागों में लोकल(Local) लोग ही घुसते तथा न ही किसी और को छेड़छाड़(Molestation) करने देते। कुछ समाज कुछ विशेष ट्री(Tree) की पूजा करते हैं और आदि काल से उनका प्रोटेक्ट(Protect) करते आ रहे हैं।

छोटानागपुर एरिया(Area) में मुंडा और संथाल जनजातियों महुआ और कंदव के ट्री(Tree) की पूजा करते हैं। उड़ीसा और बिहार की जनजातियां शादी के दौरान इमली और आम के ट्री(Tree) की पूजा करती है। इसमें से बहुत से व्यक्ति पीपल और बरगद(Banyan) को पवित्र मानते हैं। भारतीय समाज में अनेकों संस्कृतिया हैं और प्रत्येक संस्कृति में नेचर(Nature) और इसकी क्रतिया को संरक्षित करने के अपने पारंपरिक तरीके हैं।

वन एवं वन्य जीवन संसाधन एनसीआरटी कक्षा-10, पाठ-2

आमतौर पर झरने, पहाड़ी, चोटियों, ट्री(Tree) और पशुओं को पवित्र मानकर उनका संरक्षण किया जाता है। आप अनेक मंदिरों के आसपास मंकी(Monkey) और लंगूर पाएंगे। उपासक उन्हें खिलाते खिलाते हैं और मंदिर की भक्तों में गिनते हैं। राजस्थान में विश्नोई गांव के आसपास आप काले हिरण, चिंगारा, नीलगाय, और मोरों के झुंड(Herd) देख सकते हैं जो वहा के समुदाय(Community) का अभिन्न हिस्सा(Part)है और कोई उनको लॉस(Loss) नहीं पहुंचाता।

क्रियाकलाप

आप अपने आसपास के किसी ऐसे रीति रिवाज के बारे में एक लेख लिखे जो नेचर(Nature) बचाओ और संरक्षण में मदद करते हैं।

हिमालय में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन कई एरिया(Area) में वन जीवन संसाधन कटाई रोकने में ही कामयाब नहीं रहा अपितु यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों की जातियों को यूज(Use) करके सामुदायिक वनीकरण अभियान को सफल बनाया जा सकता है। पारंपरिक संरक्षण तरीकों को पुनर्जीवित अथवा पारिस्थितिक कृषि(krashi) के नए तरीकों का विकास अब व्यापक हो गया है।

टिहरी बीज बचाओ आंदोलन

टिहरी में किसानों का बीज बचाओ आंदोलन(protest) और नवदनाय ने दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग की बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक रूप से व्यवहार्य कृषि प्रोडक्शन (Production) संभव है। भारत में संयुक्त वन प्रबंधन प्रोग्राम(Program) रक्षित वन जीवन संसाधन के प्रबंध और पुन निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका के महत्व को उजागर करते हैं। औपचारिक रूप में इन प्रोग्राम(Program) की शुरुआत 1988 में हुई जब ओडिशा स्टेट(state) ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया।

वन विभाग अंतर्गत ‘संयुक्त वन प्रबंधन’ क्षरित वनो के बचाव के लिए वर्क(work) करता है और इसमें गांव के स्तर पर संस्थाये बनाई जाती है जिसमें ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप में वर्क(work) करते हैं। इसके बदले समुदाय मध्य स्तरीय लाभ जैसे गैर- इमारती वन प्रोडक्ट्स(Products) के हकदारी होते हैं तथा सफल संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी लाभ में भी भागीदार होते है।

भारत में नेचर(Nature) के विनाश और पुनः निर्माण की क्रियाशीलता से सीख मिलती है कि स्थानीय समुदायों को हर जगह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में शामिल करना चाहिए। परंतु स्थानीय समुदाय को फैसले लेने की प्रक्रिया में मेन(Main) भूमिका में आने में अभी देर है। अतः वे ही डेवलपमेंट(Development) क्रियाएं मान्य होनी चाहिए जो जनमानस पर केंद्रित हो, पर्यावरण(Nature) हितैषी हो और आर्थिक रूप से प्रतिफलित हो।

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