विदेश व्यापार के मुख्य दोष(हानियां)बताइए-
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विदेश व्यापार के मुख्य दोष(हानियां)बताइए-

विदेश व्यापार के प्रमुख दोष (हानियां) निम्नलिखित है-

1-कच्चे माल की शीघ्र समाप्ति-


विदेश व्यापार के कारण निर्मित वस्तुओं/प्राथमिक वस्तुओं की मांग में अत्याधिक वृद्धि हो जाती हैं। जिससे कुछ देशों में कच्चे माल, मुख्य तो खनिज पदार्थों के भंडार शीघ्र समाप्त हो जाते हैं।

2-घरेलू उद्योगों को हानि-

कभी-कभी विदेशी प्रतियोगिता घरेलू (स्वदेशी) उद्योगों के विकास के लिए अत्यंत घटक सिद्ध होती है, उदाहरण के लिए-19वीं शताब्दी मैं ब्रिटिश प्रतियोगिता के कारण भारतीय उद्योगों को गहरा आघात पहुंचा था।

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3-राशिपातन का दुष्प्रभाव-

जब विकसित देश विकासशील देशों में अपने माल को खपाने के लिए राशि पतन की नीति अपनाते हैं तो उनका स्वदेशी उद्योगों पर बहुत खाता प्रभाव पड़ता है।

4-देश की अर्थव्यवस्था का एकांकी विकास-

विदेश व्यापार से प्रेरित श्रम विभाजन के कारण देश में केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है, किनसे उसे लाभ होता है, परिणाम देश का बहुमुखी विकास नहीं हो पाता और देश के बहुत से साधन बेकार पड़े रहते हैं।यह एकांगी विकास सुरक्षा की दृष्टि से अत्यधिक घातक है।

5-विदेशों पर निर्भरता-

विदेश व्यापार के कारण प्राय सभी देश एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं। इसका आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

6-आवश्यक वस्तुओं का अभाव-

यदि कभी विशिष्ट परिस्थितियों के कारण किसी आवश्यक वस्तु का आयत बंद हो जाता है। तो जनता को कष्ट उठाना पड़ता है।

7-कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्थाओं को हानि-

विदेश व्यापार से प्रयोग कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्थाओं को हानि होती है,क्योंकि कृषि क्षेत्र में उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होने के कारण उत्पादन लागत में वृद्धि हो जाती है।

8-अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में संघर्ष एवं वैमनस्य-

विदेश व्यापार के दौरान परस्पर हितों में संघर्ष हो जाने के कारण बहुदा विभिन्न देशों के मध्य तनाव की-सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिससे विश्व शांति को खतरा उत्पन्न हो जाता है।

9-राजनीतिक दासता-

विदेश व्यापार के फल स्वरुप कभी-कभी राजनीतिक उपनिवेश बन जाते हैं। यह उपनिवेश आर्थिक दृष्टि से मात्र देशों के गुलाम हो जाते हैं।

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