संसाधन और विकास पाठ-1 Ncrt Class 10

संसाधन नियोजन

संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एंपलॉयर(Employer) एक सर्वमान्य रणनीति है। इसलिए भारत जैसे देश में जहां संसाधनों की अवेलेबिलिटी (Availability) में बहुत अधिक विविधता है, यह और भी इंपॉर्टेंट(Importent) है। यहां ऐसे प्रदेश भी है जहां एक तरह के संसाधनों(Resources) की प्रचुरता है, परंतु दूसरे तरह के संसाधनों की कमी है। कुछ ऐसे प्रदेश भी है जो संसाधनों की उपलब्धता के संदर्भ में सेल्फ डिपेंडेंट(Self dependent) है और कुछ ऐसे स्टेट(state) भी है जहां महत्वपूर्ण संसाधनों के अत्यधिक कमी है।

उदाहरण के लिए झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि स्टेट(state) में खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं। अरुणाचल प्रदेश में जल रिसोर्स(Resource) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, परंतु मूल डेवलपमेंट(Development) की कमी है। राजस्थान में पवन और सोलर एनर्जी(Solar energy) संसाधनों की बहुतायत है लेकिन जल संसाधन की कमी है। लद्दाख का शीत मरुस्थल देश के अन्य भागों से अलग-थलग पड़ता है।

यह स्टेट(state) सांस्कृतिक विरासत का धनी है परंतु यहां जल, आधारभूत अवसंरचना तथा कुछ इंपॉर्टेंट (Importent) खनिजों की कमी है। इसलिए राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक और लोकल(Local) स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता है।

क्रियाकलाप

अपने स्टेट(state) में पाए जाने वाले संसाधनों की लिस्ट(List) तैयार करें और जिन महत्वपूर्ण संसाधनों की आपके राज्य में कमी उनकी पहचान करें।

भारत में संसाधन नियोजन

संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें निम्नलिखित सोपान है- (क) देश के विभिन्न स्टेट(state) में संसाधनों की पहचान कर उनकी टेबल(Table) बनाना। इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों की क्वालिटी (Quality) एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन करना है।

(ब) संसाधन डेवलपमेंट(Development) योजनाए लागू करने के लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी(Technology), कौशल और संस्थागत नियोजन फ्रेम(frame) तैयार करना।

(ग) संसाधन विकास योजनाओं और नेशनल डेवलपमेंट (National development) योजना में समन्वय स्थापित करना।

स्वाधीनता के बाद इंडिया(India) में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की सप्लाई(Supply) के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गए।

ज्ञात करो

समुदाय भागीदारी की सहायता से समुदाय/ ग्राम पंचायत / वार्ड स्तरीय समुदायों द्वारा आपके आसपास के क्षेत्र में कौन से संसाधन विकसित किए जा रहे हैं?

किसी एरिया(Area) के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्तें है। परंतु टेक्नोलॉजी (Technology) और संस्थाओ में परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की अवेलेबिलिटी(Availability) से ही विकास संभव नहीं है। देश में बहुत से क्षेत्र है जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी है जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से डेवलप्ड (Developed) है।

उपनिवेशन का हिस्ट्री(History) हमें बताता है कि उपनिवेश में संसाधन संपन्न स्टेट(Rich state), विदेशी आक्रमणकारियों के लिए मुख्य आकर्षण रहे है। उपनिवेश कारी देशों ने बेहतर टेक्नोलॉजी(Technology) के सहारे उपनिवेशो के रिसोर्सेज(Resources) का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

अतः संसाधन किसी भी स्टेट(state) के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहा उपयुक्त टेक्नोलॉजी (Technology) विकास और संस्थागत परिवर्तन किया जाए। उपनिवेशन के विभिन्न चरणों में इंडिया(India) में इन सब का अनुभव किया है। अतः भारत में विकास सामान्यतः तथा संसाधन विकास लोगों के मुख्यतः संसाधनो की अवेलेबिलिटी(Availability) पर ही आधारित नहीं है था बल्कि इसमें प्रोद्योगिकी, मानव संसाधन की क्वालिटी (Quality) और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है।

संसाधनों का संरक्षण

संसाधन किसी भी तरह के विकास में इंपॉर्टेंट (Importent) भूमिका निभाते हैं। परंतु संसाधनों का विवेकहीन उपयोग और अति उपयोग के कारण कई सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय प्रॉब्लम(Problem) पैदा हो सकती हैं। इन समस्याओं से बचाव के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। भूतकाल से ही संसाधनों का प्रोटेक्शन(Protection) बहुत से नेताओं और चिंतको के लिए चिंता का विषय रहा है।

उदाहरण के लिए गांधीजी ने संसाधनों के प्रोटेक्शन (Protection) पर अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त की है- हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच(gluttony) की संतुष्टि के लिए नहीं। दूसरे शब्दों में हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।

उनके अनुसार वर्ल्ड लेवल(World level) पर संसाधन हास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक टेक्नोलॉजी (Technology) की शोषणत्मक प्रवृति जिम्मेदार है। वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा प्रोडक्शन (Production) के पक्षधर थे।

यह भी जाने

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 में क्लब ऑफ रोम ने की। तत्पश्चात 1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक स्माल ब्यूटीफुल में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृति की है। 1987 में ब्रूंड लेंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया।

इस रिपोर्ट ने सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की है। यह रिपोर्ट बाद में हमारा साझा विषय (Our Common Future) शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण योगदान रियो डी जेनेरो, ब्राजील में 1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन द्वारा किया गया।

भू-संसाधन

हम भूमि पर रहते हैं इसी पर अनेकों आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं और विभिन्न रूपों में इसका यूज(Use) करते हैं। अतः भूमि एक बहुत इंपॉर्टेंट(Importent) प्राकृतिक संसाधन है। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक क्रियाएं, ट्रांसपोर्टेशन(transportation) तथा संचार व्यवस्थाएं भूमि पर ही आधारित है। परंतु भूमि एक लिमिटेड(Limited) संसाधन है, इसलिए उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए।

संसाधन एवं विकास कक्षा-10, पाठ-1
संसाधन विकास

भारत में भूमि पर डिफरेंट(Different) प्रकार की भू-आकृतियां जैसे पर्वत, पठार मैदान और द्वीप पाए जाते हैं। लगभग 43% भू-क्षेत्र मैदान है जो कृषि और इंडस्ट्री (Industry) के विकास के लिए सुविधाजनक है। पर्वत पूरे भू-क्षेत्र के 30% भाग पर विस्तृत है। वे कुछ बारहमासी नदियों के प्रभाव से सुनिश्चित करते हैं, टूरिज्म(tourism) विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करता है और पारिस्थितिक के लिए इंपॉर्टेंट(Importent) है। देश के क्षेत्रफल का लगभग 27% हिस्सा पठारी क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है।

संसाधन एवं विकास कक्षा-10, पाठ-1
संसाधन विकास व उनके नियोजन

भ-उपयोग

1. वन

2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि

  • (अ) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि।
  • (ब) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि- जैसे बिल्डिंग्स(buildings), सड़क, उद्योग इत्यादि।

3. परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि(krashi) अयोग्य भूमि

  • (अ) स्थाई चारागाह तथा अन्य गोचर भूमि।
  • (ब) विभिन्न ट्री(Tree), वृक्ष फसलों, तथा उपवनों(Groves) के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र(Area) में शामिल नहीं है)
  • (स) कृषि योग्य बंजर भूमि जहां 5 से अधिक वृक्षों से फार्मिंग(Farming) ना की गई हो।

भारत में भू- उपयोग प्रारूप

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है। परंतु इसके 93% भाग के ही भू- उपयोग आंकड़े उपलब्ध है क्योंकि पूर्वोत्तर प्रांतों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वे(Survey) भी नहीं हुआ है।

संसाधन एवं विकास परिणाम

स्थाई चारागाहो के अंतर्गत भी भूमि कम हुई है। पशुधन की इतनी बड़ी संख्या के लिए चारा अवेलेबल(available) कराने में कैसे समर्थ होंगे? और इसके क्या परिणाम होंगे? वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि अनूपजाऊ है इन पर फसलें उगाने के लिए एग्रीकल्चर(Agriculture) लागत बहुत ज्यादा है। अतः इस भूमि में 2 या 3 वर्षों में इनको एक या दो बार बोया जाता है और यदि इसे शुद्ध (निवल) बोए गए एरिया(Area) में शामिल कर लिया जाता है तब भी भारत के कुल सूचित क्षेत्र के लगभग 54% हिस्से पर ही फार्मिंग(Farming) हो सकती है।

शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र का प्रतिशत भी विभिन्न स्टेट (state) में भिन्न-भिन्न है। पंजाब और हरियाणा में 80% भूमि पर खेती होती है, परंतु अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार दीप समूह में 10% से भी कम एरिया(Area) बोया जाता है।

हमारे देश में राष्ट्रीय वन नीति 1952 द्वारा निर्धारित वनों के अंतर्गत 33 प्रतिशत भौगोलिक एरिया(Area) वांछित है। जिसकी तुलना में वन के अंतर्गत क्षेत्र काफी कम है। वन नीति द्वारा निर्धारित यह सीमा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। वन एरिया(Area) के आसपास रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर करती है। भू-उपयोग का एक भाग बंजर भूमि और दूसरा नॉन एग्रीकल्चर (Non agriculture) प्रयोजनों में लगाई गई भूमि कहलाता है।

बंजर भूमि

बंजर भूमि में पहाड़ी चट्टाने(Rock), सुखी और मरुस्थलीय भूमि शामिल है। गैर कृषि(Krashi) प्रयोजनों में लगाई गई भूमि में बस्तियां, सड़के, रेल लाइन(Rail Line), उद्योग इत्यादि आते है। लंबे समय तक लगातार भूमि प्रोटेक्शन(Protection) और प्रबंधन की अवहेलना करने एवं लगातार(continuously) भू-उपयोग के कारण भू – संसाधनों का निम्नीकरण हो रहा है। इसके कारण समाज(society) और पर्यावरण पर गंभीर(serious) आपदा आ सकती है।

एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित एरिया(Area) कहलाता है।

भू -उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्वों में भौतिक कारक जैसे भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार तथा मानवीय कारक जैसे जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिकी क्षमता, संस्कृति और परंपराएं इत्यादि शामिल है।

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है। परंतु इसके 93% भाग के ही भू- उपयोग आंकड़े उपलब्ध है क्योंकि पूर्वोत्तर प्रांतों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वे(Survey) भी नहीं हुआ है।

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