सूखा

सूखा क्या है? | सूखी आपदा के कारण | सूखी आपदा के प्रभाव

सूखा क्या है-

किसी भी क्षेत्र मे होने वाली सामान्य वर्षा मे 25% या उससे ज्यादा कमी होने पर उसे आमतौर पर सुखे की स्थिति कहा जाता है। गंभीर सूखे की स्थिति ज्यादा देर से आती है। गंभीर सूखे की स्थिति को हम तब कहते है जब या तो वर्षा मे 50% से अधिक की कमी हो या दो वर्षों तक निरंतर सूखे की परिस्थिति बनी रहें।


सिंचाई आयोग की 1972 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के वे क्षेत्र जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 75 से.मी. से कम हो, साथ ही कुल वार्षिक वर्षा मे सामान्य से 25% तक परिवर्तन हो सुखा ग्रस्त क्षेत्र कहा गया है।

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सूखा आपदा के कारण –

सूखे का आगमन धीरे-धीरे होता है और इसके आगमन तथा समाप्त होने का समय तय करना कठिन होता है। वर्षा का गिरता स्तर, गिरता हुआ भू-जल स्तर सूखे कुएं, सूखी नदियां और जलाशय तथा अपर्याप्त कृषि उपज सूखे के आगमन की चेतावनी देते है। यद्यपि सूखा एक प्राकृतिक आपदा है, सूखे की स्थिति हेतु मुख्य उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं—
1. भूमि प्रबंध की उपेक्षा।
2. सिंचाई के पारंपरिक स्त्रोतों जैसे तालाब, कुओं और टेंकों की उपेक्षा।
3. सामुदायिक वनों का विनाश।
4. वन विनाश से प्राकृतिक जलधाराओं का सूखना, वर्षा कम होने से भूमिगत जल स्तर का नीचे जाना नदियों के जल स्तर का गिरना।
5. पशुओं के लिए चारा संकट।
6. अनिश्चित क्षेत्रों मे अर्थव्यवस्था का अस्त-व्यस्त होना।
7. फसल चक्र मे तीव्र परिवर्तन।
8. वातावरण के आपसी सम्बन्ध टूटने से कृषि, उद्योग एवं घरेलू कार्य मे पानी की मांग मे अभूतपूर्व वृद्धि।
9. जल संसाधनों के दोहन की दोषपूर्ण व्यवस्था।

3-सूखे की स्थि‍ति

कृषि मंत्रालय सूखे की स्थितियों की निगरानी करने और उसका प्रबंधन करने के लिए नोडल मंत्रालय है और सूखे को मौसमी सूखा, जलीय सूखा और कृषि सूखे के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। मौसमी सूखे को दीर्घावधिक अनुपात के संदर्भ में वर्षा में हुई कमी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

यथा 25  प्रतिशत या इससे कम की दर पर वर्षा में कमी को सामान्य सूखा, 26 से 50 प्रतिशत की कमी को मध्यम सूखा और 50 प्रतिशत से अधिक की कमी को गम्भीर सूखे की स्थिति मानी जाती है।

जलीय सूखा सतह और अवसतह जल आपूर्ति में कमी होने के रूप में परिभाषित किया जाता है जिससे सामान्य  और विशेष जरूरतों के लिए जल की कमी हो जाती है।

ये स्थितियां उस समय भी उत्पन्न हो जाती हैं जब जल के बढ़े हुए उपयोग के कारण औसत वर्षा (या औसत से अधिक) वाले समय में भी आरक्षित जल समाप्त हो जाता है।

कृषि सूखा को चार लगातार सप्ताहों तक मौसमी सूखे के रहने पर निर्धारित किया जाता है। ऐसी स्थिाति तब उत्तापन्न  होती है जब खरीफ के मौसम में  80 प्रतिशत फसल रोपी गई हो और सप्ताहिक जल वृष्टि 15 मई से 15 अक्तूबर के बीच 50 मिलीमीटर और शेष वर्ष में ऐसी जल वृष्टि 6 लगातार सप्ता1ह के दौरान हुई हो।

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4-सूखा प्रभावित क्षेत्र

भारत में देश का लगभग 68  प्रतिशत हिस्सा विभिन्न मात्राओं में सूखे से प्रभावित रहता है । भारत का 35 प्रतिशत हिस्सा  ऐसा है जिसमें 750 मिलीमीटर और 1125 मिलीमीटर के बीच वर्षा होती है और उसे सूखा प्रभावित क्षेत्र माना जाता है, जबकि भारत के 33 प्रतिशत हिस्से में 750 मिलीमीटर से कम वर्षा होती है और इसे गम्भीर सूखा प्रभावित क्षेत्र माना जाता है।

5-सूखा अपदा के प्रभाव-

प्रारंभ मे सुखे का प्रभाव आधारित फसलों पर तथा बाद मे सिंचित फसलों पर पड़ता है। जिन क्षेत्रों मे वर्षा को छोड़कर वैकल्पिक जल स्त्रोत कम हो, जहाँ कृषि को छोड़कर अन्य आजिविकाएं कम से कम विकसित हो,

सूखे की दृष्टि से सर्वाधिक असुरक्षित होते है। सूखा आपदा का सबसे बड़ा असर देश के करोड़ों भूमिहीन किसानों ग्रामीण कारीगरों, सीमान्त कृषकों, महिलाओं, बच्चों और खेती से जुड़े मवेशियों पर पड़ता है।


अन्य प्राकृतिक आपदाओं से हटकर सूखे के कारण कोई संरचनात्मक क्षति नही होती है। खूखा लोगों को पेयजल की तलाश मे मीलों तक चलने के लिए विवश कर देता है सूखा पड़ने पर फसल का न होना एक सामान्य घटनाक्रम है। पृष्ठभूमि मे अत्यंत न्युन पेड़ पौधे दिखाई पड़ते है।

फसले, दुग्ध उत्पादन, लकड़ी उत्पादन, बिजिली की अधिक मांग, बिजली का कम उत्पादन, बढ़ी हुई बेरोजगारी, जैव विविधता मे कमी, पानी, वायु तथा प्रकृतिक सौंदर्य के स्तर मे गिरावट, भूजल की कमी, स्वास्थ्य विकार तथा मृत्यु दर मे वृद्धि, गरीबी मे वृद्धि, जीवन स्तर मे गिरावट, सामाजिक अशांति तथा स्थान बदलने की प्रक्रिया (पलायन) सूखे के मुख्य दुष्प्रभाव है।

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