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बेरोजगारी के प्रकार लिखिए।

प्रकार बताइए भारत एक विकासशील देश है ; अत : यहाँ ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी का स्वरूप एक – सा नहीं पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी के तीन मुख्य रूप दिखाई देते हैं – खुली बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी। शहरों में पाई जाने वाली बेरोजगारी मुख्यत: दो प्रकार की है- औद्योगिक बेरोजगारी और शिक्षित बेरोजगारी।

ग्रामीण बेरोजगार-

भारत में ग्रामीण बेरोजगारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है।

खुली बेरोजगारी –

इससे हमारा अभिप्राय उन व्यक्तियों से है , जिन्हें जीवनयापन हेतु कोई कार्य नहीं मिलता। इसे स्थायी बेरोजगारी भी कहा जाता है। इस स्थायी बेरोजगारी के अन्तर्गत भारतीय गाँवों में बहुत सारे व्यक्ति बेरोजगार रहते हैं। स्थायी बेरोजगारी का मुख्य कारण कृषि पर जनसंख्या की अत्यधिक निर्भरता है।

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मौसमी बेरोजगारी –

इस प्रकार की बेरोजगारी वर्ष के कुछ महीनों में अधिक दिखाई देती है। श्रम की माँग में होने वाले परिवर्तनों में मौसमी बेरोजगारी की मात्रा भी परिवर्तित होती रहती है। सामान्यत : फसलों के बोने तथा काटने के समय श्रम की अधिक माँग रहती है , परन्तु अन्य मौसमों में रोजगार उपलब्ध नहीं होता। ग्रामीणों को सामान्यतया वर्ष में 128 से 196 दिन तक बेरोजगार रहना पड़ता है।

छिपी हुई बेरोजगारी –

जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है , तब उसे छिपी हुई या अदृश्य बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी का अनुमान लगाना कठिन है। देश की लगभग 67 % जनसंख्या कृषि में संलग्न है , जबकि इतनी जनशक्ति की वहाँ आवश्यकता नहीं है।

शहरी बेरोजगारी-

भारत में शहरी बेरोजगारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है।

औद्योगिक बेरोजगारी –

औद्योगिक क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी को ‘ औद्योगिक बेरोजगारी ‘ कहा जाता है। इस प्रकार की बेरोजगारी चक्रीय तथा तकनीकी बेरोजगारी से प्रभावित होती है।

शिक्षित बेरोजगारी –

शिक्षा के प्रसार के साथ – साथ इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रसार हो रहा है। देश में शिक्षित बेरोजगारी की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई है। ‘ भारत में प्रशिक्षितों की बेरोजगारी ‘ नामक पुस्तक में स्थिति का मूल्यांकन इन शब्दों में किया गया है- ” हमारे शिक्षित युवकों में बढ़ती हुई बेरोजगारी हमारे राष्ट्रीय स्थायित्व के लिए जबरदस्त खतरा है।

उसे नियन्त्रित करने के लिए यदि समयोचित कदम नहीं उठाया गया तो भारी उथल – पुथल का अन्देशा है । ” बेरोजगारी एक अभिशाप है। इससे एक ओर राष्ट्र के बहुमूल्य साधनों की बरबादी होती है तो दूसरी ओर निर्धनता , ऋणग्रस्तता , औद्योगिक अशान्ति आदि को बल मिलता है।

सामाजिक दृष्टि से अपराधों में वृद्धि होती है तथा राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है, जिसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अत : राज्य के नीति – निदेशक तत्त्वों में कहा गया है कि आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है।

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