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  7. मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार-

मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार-

मानव नेत्र-

मानव नेत्र अत्यंत मूल्यवान एवं सुग्राही ज्ञानेंद्रिय है। या हमें इस अद्भुत संसार तथा हमारे चारों ओर के रंगों को देखने योग्य बनाता है। आंखें बंद करके हम वस्तुओं को उनकी गंद, स्वाद, उनके द्वारा उत्पन्न ध्वनि या उनको स्पर्श करके, कुछ सीमा तक पहचान सकते हैं, तथापि आंखों को बंद करके रंगों को पहचान पाना असंभव है। इस प्रकार समस्त ज्ञानेंद्रियों में मानव नेत्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है,क्योंकि यहां हमें हमारे चारों ओर के रंग बिरंगे संसार को देखने योग्य बनाता है।

मानव नेत्र
मानव नेत्र

मानव नेत्र एक कैमरे की भांति है। इसका लेंस-निकाह एक प्रकाश-सुग्राही पर्दे, जिसे रेटिना या दृष्टि पटल कहते हैं, पर प्रतिबिंब बनता है। प्रकाश एक पतली झिल्ली से होकर नेत्र में प्रवेश करता है।

इस झिल्ली को कार्निया या स्वच्छ मंडल कहते हैं। यह झिल्ली नेत्र गोलाक कि अग्र पृष्ठ पर एक पारदर्शी उभार बनती है। नेत्र गोलाक की आकृति लगभग गोलाकार होती है तथा इस का व्यास लगभग 2.3 cm होता है।

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समंजन क्षमता-

अभिनेत्र लेंस रेशेदार दिल्ली वत पदार्थ का बना होता है। इसकी वक्रता में कुछ सीमाओं तक पक्षाभी पेशियों द्वारा रूपांतरण किया जा सकता है। अभिनेत्र लेंस की वक्रता में परिवर्तन होने पर इसकी फोकस दूरी भी परिवर्तित हो जाती है। जब पेशीया शिथिल होती है तो अभिनेत्र लेंस पतला हो जाता है।

इस प्रकार इसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है। इस स्थिति में हम दूरी रखी वस्तुओं को स्पष्ट देख पाने में समर्थ होते हैं। जब आप आंख के निकट की वस्तुओं को देखते हैं, तब पक्ष्माभी पेशियां सिकुड़ जाती है। इससे अभिनेत्र लेंस की वक्रता बढ़ जाती है। अभिनेत्र लेंस अब मोटा हो जाता है। परिणाम स्वरुप, अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी घट जाती है। इससे हम निकट रखी वस्तुओं को स्पष्ट देख सकते हैं।

दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन-

कभी-कभी नेत्र धीरे-धीरे अपनी समंजन क्षमता खो सकते हैं। ऐसी स्थितियों में, व्यक्ति वस्तुओं को आराम से सुस्पष्ट नहीं देख सकते हैं। नेत्र में अपवर्तन दोषों के कारण दृष्टि धुंधली हो जाती है।

प्रमुख रूप से दृष्टि के तीन सामान्य अपवर्तन दोष होते हैं। यह दोष है-
1-निकट दृष्टि (myopia)
2-दीर्घ-दृष्टि (hypermetropia)
3-जरा-दूरदृष्टिता(Presbyopia)

इन दोषों को उपयुक्त गोलियां लेंस के उपयोग से संशोधित किया जा सकता है। हम इन दोषों तथा उनके संशोधन के बारे में संक्षेप में नीचे चर्चा करेंगे।

(a) निकट दृष्टि दोष-

निकट दृष्टि दोष को निकटदृष्टिता भी कहते हैं। निकट दृष्टि दोष युक्त कोई व्यक्ति निकट रखी वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है, परंतु दूर रखी वस्तुओं को वह सुस्पष्ट नहीं देख पाता। ऐसी दोष युक्त व्यक्ति का दूर बिंदु अनंत पर न होकर नेत्र के पास आ जाता है। ऐसा व्यक्ति कुछ मीटर दूरी रखी वस्तुओं को ही सुस्पष्ट देख पाता है। निकट दृष्टि दोष युक्त नेत्र में, किसी दूरी रखी वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टि पटल पर न बनकर दृष्टि पटल के सामने बनता है।

दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन
दृष्टि दोष तथा उनका संशोधन

(b) दीर्घ-दृष्टि दोष

दीर्घ-दृष्टि दोष-
दीर्घ-दृष्टि दोष-

दीर्घ-दृष्टि दोष को दूर दृष्टिता भी कहते हैं।दीर्घ दृष्टि दोष युक्त कोई व्यक्ति दूर की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है, परंतु निकट रखी वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता। ऐसी दोष उक्त व्यक्ति का निकट बिंदु सामान्य निकट बिंदु से (25.cm) दूर हट जाता है। ऐसे व्यक्ति को आराम से उसे स्पष्ट पढ़ने के लिए पठन सामग्री को नेत्र से 25 cm से दूर हट जाता है।

(C) जरा-दूरदृष्टिता

आयु में वृद्धि होने के साथ-साथ मानव नेत्र की समंजन क्षमता घट जाती है। अधिकांश व्यक्तियों का निकट बिंदु दूर हट जाता है। संशोधक चश्मे के बिना उन्हें पास की वस्तुओं को आराम से स्पष्ट देखने में कठिनाई होती है। इस दोस्त को जरा दूरदृष्टिता कहते हैं।

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