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जीवन: एक नाटक | कक्षा-12 अपठित गद्यांश

मनुष्य को कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए। जिस वैभव को लेकर वह दर्प करने की ठानता है, वह उसका नहीं है। उसे तो वह इस रंगमंच में अपना अभिनय – कौशल दिखाने के लिए किराये के रूप में मिला है। उसका असली मालिक ईश्वर है। ईश-उपनिषद् में यह वचन मिलता है कि इस संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह ईश्वर का है।

हम ईश्वर की इस दौलत के सहारे अपना, अपने परिवार एवं अपने मित्रों का भरण-पोषण करते हैं। जब हम इस पर केवल अपना ही अधिकार मान लेते हैं, तब अकस्मात् हमारे शत्रु पैदा हो जाते हैं। हमारा नाटक शुरू होता है। एक ओर हमारा अभिमान होता है, दूसरी ओर हमारा शत्रु। वह हमसे कुछ चाहता है, परन्तु हम उसे अभिमान के वशीभूत होकर कुछ भी नहीं देना चाहते हैं। दोनों के मध्य सिंह-गर्जना चलती रहती है। नाटक पर पर्दा पड़ जाता है, हम हार जाते हैं। हमको हमारा ‘हम’ हरा देता है।

प्रश्न: (क) इस गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक लिखिए।

प्रश्न: (ख) अभिमान न करने की समझ, किस सिद्धान्त के अनुसार आती है?

प्रश्न: (ग) ईश-उपनिषद् के वचन का उल्लेख क्यों किया गया है?

प्रश्न: (घ) शत्रुता का बीज किन स्थितियों में अंकुरित हो जाता है?

प्रश्न: (ङ) इस गद्यांश में आगत ‘सिंह – गर्जना’, ‘पर्दा’ और ‘हम’ शब्दों के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: (क) शीर्षक- ‘जीवन: एक नाटक’,’ हम: हमारा शत्रु’, ‘अभिमान: हमारा शत्रु’ आदि इस गद्यांश के उपयुक्त शीर्षक हो सकते हैं।

उत्तर: (ख) इस संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह ईश्वर का है और उस पर सबका एक समान अधिकार है, इस सिद्धान्त के अनुसार हमें अभिमान न करने की समझ आती है।

उत्तर: (ग) ईश-उपनिषद् के वचन का उल्लेख यह समझाने के लिए किया गया है कि हमें जो भी वैभव अपना, अपने परिवार एवं मित्रों का भरण-पोषण करने के लिए मिला है, हमें उस पर केवल अपना अधिकार मानकर अभिमान नहीं करना चाहिए। अभिमान करना न धर्मसम्मत है और न ही शास्त्रसम्मत । हमें जो कुछ भी मिला है, उसका मिल-बाँटकर त्यागपूर्वक उपभोग करना चाहिए।

उत्तर: (घ) शत्रुता का बीज तब अंकुरित होता है, जब हम प्राप्त वैभव पर केवल अपना अधिकार मान लेते हैं। दूसरा कोई जब हमसे कुछ माँगता है और हम अभिमानवश उसे कुछ देना नहीं चाहते, बस यहीं से संघर्ष अथवा शत्रुता का जन्म होता है।

उत्तर: (ङ) सिंह – गर्जना – आधिपत्य स्थापित करने हेतु संघर्ष, टकराहट।
पर्दा मृत्यु का आवरण।
हम – अभिमान, अहम् की भावना।

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