वाष्पोत्सर्जन क्या है, प्रकार व अंतर (12th, Biology, Lesson-1)

वाष्पोत्सर्जन के बारे में

“पौधे के वायवीय भागों (pneumatic parts) द्वारा जल के वाष्प (water vapour) के रूप में हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं”

पौधे अपनी जड़ों द्वारा मृदा (soil) से जल का निरंतर अवशोषण करते रहते हैं। यह जल रसारोहण (ascent of sap) द्वारा पौधे के विभिन्न भागों में पहुंचता है। पौधे द्वारा अवशोषित (absorbed) जल की कुल मात्रा उसकी अपनी आवश्यकता से बहुत अधिक होती है। इस जल की कुछ ही मात्रा उसकी (पौधे की) वृद्धि तथा विकास (Plant growth) में काम आती है तथा आवश्यकता से अधिक जल की मात्रा पौधे की वायवीय भागो (स्तंभ, पत्तियों, कलियों एवं पुष्पों) से वाष्प के रूप में बाहर निकल जाती है जो संपूर्ण अवशोषित जल का लगभग 95% होती है। इसी क्रिया को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं।

वाष्पोत्सर्जन और वाष्पीकरण में अंतर

क्रमांकवाष्पोत्सर्जनवाष्पीकरण
1.यह एक जैविक (vital) क्रिया है।यह एक भौतिक क्रिया है।
2.यह क्रिया मुख्यतः रंध्रों (stomata) द्वारा होती है।यह किसी भी सतह से हो सकती है।
3.इसमें पानी वाष्प के रूप में पौधों के वायवीय भागों से निकलता है।इसमें पानी वाष्प (vapor) के रूप में पानी की किसी भी स्वतंत्र सतह से निकलता है।
4.पानी की प्रति इकाई क्षेत्रफल (area per unit) हानि अधिक होती है।पानी की प्रति इकाई क्षेत्रफल हानि कम होती है।
5.यह एक नियमित (regulated) क्रिया है।यह एक अनियमित (non-regulated) क्रिया है।
6.इस क्रिया में कई प्रकार के दाब (pressure), जैसे- चूषण दाब, परासरण दाब आदि भाग लेते हैं।यह किसी दाब द्वारा नियंत्रित नहीं होती है।

वाष्पोत्सर्जन के कारण होने वाली जल की हानि (water loss) बहुत अधिक होती है तथा इसकी मात्रा विभिन्न पौधों में भिन्न-भिन्न होती है। जल संतृप्त अवस्था (saturated state) में उगने वाला ताड़ (palm) का वृक्ष एक दिन में 10-20 लीटर जल की हानि कर सकता है जबकि सेब का वृक्ष 1 दिन में 10 से 20 लीटर जल की हानि कर सकता है। मक्के का एक पौधा प्रतिदिन 3-4 लीटर जल की हानि कर सकता है जबकि मरुस्थलीय जलवायु में वृक्ष के आकार का एक कैक्टस (कैक्टस) प्रतिदिन 0.02 लीटर से भी कम जल की हानि करता है। सामान्यतः C₄ पौधों की अपेक्षा C₃ पौधों में जल हानि अधिक होती है।

वाष्पोत्सर्जन का प्रदर्शन

मिट्टी के एक गमले (clay pot) में एक पौधा लगाकर उसमें पहले बहुत पानी दे। अब गमले कि मिट्टी को रबर की चादर (Rubber wrap) से अच्छी तरह बंद कर दे ताकि मिट्टी में से जल न उड़ सके। इस गमले को एक बेलजार की नीचे रखकर बेलजार को वेसलीन या ग्रीस लगाकर (air tight) कर दें। कुछ देर बाद बेलजार की दीवारों (wall) पर जल की छोटी-छोटी बूंदे जमा हो जाएगी। इससे सिद्ध होता है कि पत्तियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन (transpiration) होने से निकली वाष्प ठंडी (vapor cool) होने से बेलजार पर छोटी-छोटी बूंदों (drops) के रूप में एकत्र हो गयी है।

वाष्पोत्सर्जन क्या है, प्रकार व अंतर (12th, Biology, Lesson-1)

वाष्पोत्सर्जन के प्रकार

यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- रंध्री वाष्प उत्सर्जन (Stomatal transpiration), उपत्वचीय वाष्प उत्सर्जन (epidermal transpiration), वातरंध्री वाष्प उत्सर्जन (Vasoconstriction)।

रंध्री वाष्पोत्सर्जन

रंध्री वाष्पोत्सर्जन पत्तियों पर स्थित रंध्रों (stomata) द्वारा होता है। इसे पणीय वाष्पोत्सर्जन (foliar transpiration) भी कहते हैं। यह कुल वाष्प उत्सर्जन का लगभग 80-95% होता है।

उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन

उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन पौधों की बाहरी त्वचा के ऊपर पायी जाने वाली उपत्वचा अथवा उपचर्म (cuticle) द्वारा होता है। यह कुल वाष्प उत्सर्जन का 5-10% तक होता है। उष्ण कटिबंधीय (tropical) जलवायु में इसकी दर अपेक्षाकृत अधिक तथा मरुस्थली (desert) जलवायु में कम होती है।

वातरंध्री वाष्पोत्सर्जन

वातरंध्री वाष्पोत्सर्जन काष्ठीय के तने तथा कुछ फलों में पाये जाने वाले वातरंध्र (lenticel) द्वारा होता है। यह कुल वाष्प उत्सर्जन का केवल 0.1-1%, अर्थात नगण्य होता है।

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