देवभूमि उत्तराखंड पर निबंध (uttarakhand tourism par nibandh)
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देवभूमि उत्तराखंड पर निबंध (uttarakhand tourism par nibandh)

प्रस्तावना –

देवों के देव महादेव की निवास – भूमि कैलाश को अपनी गोद में संजोए पर्वतराज हिमालय की उपात्यकाओं में स्थित उत्तराखण्ड राज्य को प्रकृति के अलौकिक सौन्दर्य का वरदान मिला है । हिमालय को जहाँ देवी पार्वती का पिता कहा जाता है , वहीं यह देवताओं की सर्वाधिक रमणीय भूमि के रूप में भी प्रसिद्ध है । इसीलिए इसे देवभूमि भी कहा जाता है । हिमालय की गोद में स्थित उत्तराखण्ड राज्य की भूमि बड़ी पवित्र है । यहाँ पर चार प्रसिद्ध धाम स्थित हैं तो देवी गंगा का उद्गम स्थल भी यहीं स्थित है । इसलिए यह राज्य अपनी पावनता एवं प्राकृतिक सुन्दरता के क्षेत्र में भारत के सभी राज्यों में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है यहाँ की फूलों की घाटी तो अपनी सुन्दरता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है , इसलिए उसे विश्व धरोहरों की सूची में रखा गया है धन्य है देवभूमि उत्तराखण्ड और धन्य हैं यहाँ के निवासी ।

पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र

देवभूमि उत्तराखण्ड के सौन्दर्य का ही आकर्षण है , जो विश्वभर के पर्यटक इसकी ओर खिंचे चले आते हैं । यहाँ की हिमाच्छादित पर्वतशृंखला , हरे – भरे वन , वनों में रहनेवाले दुर्लभ वन्यजीव और तीर्थस्थलों की पावन – शृंखला प्रत्येक देश – जाति के प्रकृति – प्रेमियों को यहाँ तक खींच लाती है ।

देवभूमि उत्तराखंड पर निबंध (uttarakhand tourism par nibandh)
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देवभूमि उत्तराखंड पर निबंध (uttarakhand tourism par nibandh)

उत्तराखण्ड की भौगोलिक स्थिति

उत्तराखण्ड राज्य की सीमा चीन ( तिब्बत ) और नेपाल से लगती है । इस उत्तरी राज्य के उत्तर – पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण दिशा में उत्तर प्रदेश स्थित है ।

उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 28 ° 43 उत्तरी आंक्षाश से 31 ° 27 ” उत्तरी अक्षांश और 77 ° 34 ‘ पूर्वी देशान्तर से 81 ° 02 ‘ पूर्वी देशान्तर रेखाओं के बीच में 53,483 वर्ग किमी है , जिसमें से 43,035 वर्ग किमी पर्वतीय है और 7,448 वर्ग किमी मैदानी है । इसका 34,661 वर्ग किमी भूभाग वनाच्छादित है । राज्य का अधिकांश उत्तरी भाग वृहत्तर हिमालयी शृंखला का भाग है , जो ऊँची हिमाच्छादित चोटियों और हिमनदियों से ढका हुआ है इसकी निम्न तलहटियाँ सघन वनों से ढकी हुई हैं , जिनका स्वतन्त्रता से पूर्व अंग्रेज लकड़ी – व्यापारियों और स्वतन्त्रता के पश्चात् वन अनुबन्धकों द्वारा दोहन किया गया ।

हाल ही के वनीकरण के प्रयासों के परिणामस्वरूप स्थिति प्रत्यावर्तन में पर्याप्त सफलता मिली है । हिमालय का विशिष्ट पारिस्थितिकतन्त्र बड़ी संख्या में पशुओं ( जैसे भड़ल , हिमतेंदुआ , तेंदुआ और बाघ ) , पौधों और दुर्लभ जड़ी – बूटियो का घर है । भारत की दो सबसे महत्त्वपूर्ण नदियाँ गंगा और यमुना इसी राज्य में जन्म लेती हैं और मैदानी क्षेत्रों तक पहुँचते – पहुँचते मार्ग में पड़नेवाले बहुत – से तालाबों , झीलों , हिमनदियों की पिघली बर्फ से जल ग्रहण करती हैं । यहाँ स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है ।

उत्तराखण्ड हिमालय श्रृंखला की दक्षिणी ढलान पर स्थित है । यहाँ मौसम और वनस्पति में ऊंचाई के साथ – साथ बहुत परिवर्तन होता है । यहाँ सर्वोच्च ऊंचाई पर यदि हिमनद स्थित हैं तो निचले स्थानों पर उपोष्णकटिबन्धीय वन है । राज्य के सबसे ऊँचे स्थान हिम और पत्थरों से युक्त नंगी चोटियाँ हैं । उनसे नीचे 6,000 से 3,000 मीटर तक घास और झाड़ियों से ढके स्थान है । समशीतोष्ण शंकुधारी वन , पश्चिम हिमालयी उपअल्पाइन शंकुधारी वन , वृक्षरेखा से कुछ नीचे उगते हैं 3,000 से 2,600 मीटर की ऊंचाई पर समशीतोष्ण पश्चिम हिमालयी चौड़ी पत्तियों वाले वन है ।

नीचे हिमालयी उपोष्णकटिबन्धीय पाइन वन हैं । गंगा के मैदानों में नम पतझड़ी वन हैं । सवाना और घासभूमि उत्तर प्रदेश से लगती हुई निचली भूमि को ढके हुए है । इसे स्थानीय क्षेत्रों में भावर के नाम से जाना जाता है निचली भूमि के अधिकांश भाग को खेती के लिए साफ कर दिया गया है।

उत्तराखण्ड के प्रमुख पर्यटन-स्थल

1) मुख्य राष्ट्रीय उद्यान

भारत के अनेक राष्ट्रीय उद्यान इस राज्य में हैं , जैसे — जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान ( भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान ) रामनगर , नैनीताल जिले में , फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान और नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान , चमोली जिले में हैं ये दोनों यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के साथ – साथ यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थल भी हैं

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2) उत्तराखण्ड के चार धाम-

भारतीय धर्मग्रन्थों के अनुसार यमुनोत्री , गंगोत्री , केदारनाथ और बद्रीनाथ हिन्दुओं के सबसे पवित्र स्थान होने के कारण पर्यटन के प्रमुख केन्द्र हैं इनको चार धाम के नाम से भी जाना जाता है । धर्मग्रन्थों में कहा गया है कि जो पुण्यात्मा यहाँ का दर्शन करने में सफल होते हैं , उनका न केवल इस जन्म का पाप धुल जाता है वरन् वे जीवन – मरण के बन्धन से भी मुक्त हो जाते हैं इस स्थान के सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि यह वही स्थल है , जहाँ पृथ्वी और स्वर्ग एकाकार होते हैं तीर्थयात्री इस यात्रा के दौरान सबसे पहले यमुनोत्री ( यमुना ) और गंगोत्री ( गंगा ) का दर्शन करते है यहाँ से पवित्र जल लेकर श्रद्धालु केदारेश्वर पर जलाभिषेक करते हैं इन तीर्थ यात्रियों के लिए परम्परागत मार्ग इस प्रकार है

हरिद्वार – ऋषिकेश – देवप्रयाग – टिहरी – धरासु – यमुनोत्री- उत्तरकाशी – गंगोत्री – त्रियुगनारायण – गौरीकुण्ड – केदारनाथ

यह मार्ग परम्परागत हिन्दू धर्म में होने वाली पवित्र परिक्रमा के समान है जबकि केदारनाथ जाने के लिए दूसरा मार्ग ऋषिकेश से होते हुए देवप्रयाग , श्रीनगर , रुद्रप्रयाग , अगस्तमुनि , गुप्तकाशी और गौरीकुण्ड से होकर जाता है । केदारनाथ के समीप हो मन्दाकिनी का उद्गम स्थल है । मन्दाकिनी नदी रुद्रप्रयाग में अलकनन्दा नदी में जाकर मिलती है।

पर्यटकों को दी जानेवाली सुविधाएँ

उत्तराखण्ड सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यहाँ पर्यटकों को दी जाने वाली सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया है । इसके लिए सभी पर्यटन स्थलों तक पहुँचने के लिए अच्छी और चौड़ी सड़कों का निर्माण कराया है । अनेक सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग और राज्य हरिद्वार टिहरी घरासु राजमार्ग का दर्जा प्रदान कर आवागमन को सुचारु बनाया गया है । चार धाम मार्ग पर पर्यटकों के ठहरने और खाने – पीने की अच्छी व्यवस्था की है । आपात स्थिति से निपटने के लिए यहाँ विशेष व्यवस्था की गई है । अनेक पर्यटन स्थलों को वायु मार्गों से जोड़ा गया है । केदारनाथ में तो इस वर्ष तीर्थ यात्रियों के लिए लेसर शो की व्यवस्था भी की गई है , जिसमें भगवान शिव से सम्बन्धित अनेक कथाओं को मन्दिर की दीवारों पर साकार किया जाता है।

उत्तराखण्ड की भाषा

सामान्यत उत्तराखण्ड राज्य में तीन मुख्य भाषाएँ बोली जाती हैं – गढ़वाली , कुमाऊँनी और जौनसारी । भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य में कुल तेरह भाषाएँ बोली जाती है । उत्तराखण्ड की भाषाओं को लेकर सबसे पहले सर्वेक्षण करनेवाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी इनमें से अधिकतर भाषाओं की जानकारी दी थी ।

ग्रियर्सन ने सन् 1908 ई ० से लेकर सन् 1927 ई ० तक यह सर्वेक्षण करवाया था । इसके बाद उत्तराखण्ड की भाषाओं को लेकर कई अध्ययन किए गए । हाल में पंखुड़ी ‘ नामक संस्था ने भी इन भाषाओं पर काम किया । यह पूरा काम 13 भाषाओं पर ही केन्द्रित रहा । इनमें गढ़वाली , कुमाऊँनी , जौनसारी , जौनपुरी , जोहारी , रवाल्टी , बंगाड़ी , मार्छा , राजी , जाड़ , रंग ल्वू , बुक्साणी और थारू शामिल हैं । इस पर मतभेद हो सकता है कि ये भाषाएँ हैं या बोलियाँ ।

यदि विचार किया जाए कि एक बोली का अगर अपना शब्द भण्डार है , वह खुद को अलग तरह से व्यक्त करती है तो उसे भाषा कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए । अनेक विद्वानों का मानना है कि उत्तराखण्ड की भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है तो हम कह सकते हैं कि संसार में सर्वाधिक प्रसिद्ध अंग्रेजी की भी अपनी लिपि नहीं है वह रोमन लिपि में लिखी जाती है तो क्या इस आधार पर उसे भाषा मानने से इनकार किया जा सकता है ? मराठी की लिपि देवनागरी है और उसे भाषा माना गया है इसलिए उत्तराखण्ड की भाषाओं को भाषा के रूप में स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है ।

उत्तराखण्ड की इन भाषाओं में पर्याप्त मात्रा में साहित्य रचना हुई है । इन भाषाओं के प्रचार – प्रसार के माध्यम से उत्तराखण्ड की सभ्यता एवं संस्कृति को और अधिक नजदीक से जाना जा सकता है । उत्तराखण्ड की लोक – संस्कृति भारतीयता की जितनी वाहक है , यहाँ की पुण्यभूमि और प्राकृतिक सम्पदा उससे भी अधिक स्मरणीय और नमनीय है । हमें सभी को मिलकर इन भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन का भरसक प्रयत्न करना चाहिए ।

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