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व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत क्या है? | wheatstone bridge in hindi

व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत क्या है? |  wheatstone bridge in hindi

व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत क्या है इसकी संरचना तथा सूत्र और उपयोग, सन् 1833 में इंग्लैंड के वैज्ञानिक सैमुएल हण्टर क्रिस्टी ने चार प्रतिरोधों की एक विशेष व्यवस्था द्वारा अज्ञात प्रतिरोध ज्ञात किया इस व्यवस्था को व्हीटस्टोन सेतु कहते हैं। व्हीटस्टोन सेतु का प्रयोग हम अज्ञात प्रतिरोधो के मान को ज्ञात करने के लिए करते हैं।

व्हीटस्टोन सेतु (Wheatstone Bridge) एक इलेक्ट्रिकल सर्किट है जो अज्ञात प्रतिरोध को मापने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका आविष्कार सर चार्ल्स व्हीटस्टोन द्वारा 19वीं शताब्दी में किया गया था। व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत इलेक्ट्रिकल प्रतिरोधों के बीच के संतुलन पर आधारित है।

व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत:

व्हीटस्टोन सेतु में चार प्रतिरोधक (resistors) होते हैं जो एक चतुर्भुज (quadrilateral) आकार में व्यवस्थित होते हैं। इन्हें , और  (जहाँ  अज्ञात प्रतिरोध है) के रूप में नामित किया जाता है। चतुर्भुज के दो विपरीत कोनों पर एक बैटरी या वोल्टेज स्रोत और दूसरे दो विपरीत कोनों पर एक गैल्वेनोमीटर (एक प्रकार का इलेक्ट्रिकल मापन उपकरण) लगाया जाता है।

यदि किसी चतुर्भुज A B C D की चार भुजाओं में चार प्रतिरोध क्रमशः P Q R तथा S जोड़ते है। चतुर्भुज के एक विकर्ण का संबंध धारामापी तथा दूसरे विकर्ण का संबंध सेल से करके प्रतिरोधो को इस प्रकार व्यवस्थित करते है कि धारामापी में कोई विक्षेप न हो तो संतुलन कि स्थिति में दो संलग्न प्रतिरोधों का अनुपात शेष दो संलग्न प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है। P/Q = R/S

सर्किट तब "संतुलन" में होता है जब गैल्वेनोमीटर के माध्यम से कोई धारा नहीं प्रवाहित होती है। इस संतुलन स्थिति में, चतुर्भुज के दो पाशों के प्रतिरोधों का अनुपात दूसरे दो पाशों के प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है। इसका मतलब है कि:

व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत क्या है   wheatstone bridge in hindi

इस संबंध का उपयोग करके, यदि , और  के मूल्य ज्ञात हों, तो  (अज्ञात प्रतिरोध) का मान सटीक रूप से निर्धारित किया जा सकता है।

व्हीटस्टोन सेतु का व्यंजक

चित्रानुसार एक परिपथ प्रदर्शित है जिसमें चार प्रतिरोध P Q R S लगे हैं। प्रतिरोध P में I₁ धारा, प्रतिरोध R में I₂ धारा, प्रतिरोध Q में (I₁ – Ig) धारा एवं प्रतिरोध S में (I₁ + Ig) धारा बहती है। विकर्ण B D का संबंध धारामापी g तथा विकर्ण A C का संबंध सेल और कुंजी K से होता है।

परिपथ A B D A में, I₁ + Ig.G – I₂.R = 0, अब संतुलन की स्थिति में जो धारामापी से धारा बहती है वो Ig = 0, I₁.P + (0).G – I₂.R = 0, I₁.P = I₂.R = 0, I₁.P = I₂.R, I₁/I₂ =R/P समीकरण 1.

बंद परिपथ B D C B में, Ig.G + (I₂ + Ig).S – (I₁ – Ig).Q = 0, संतुलन की स्थिति में, Ig = 0, I₂.S – I₁.Q = 0, I₂.S = I₁.Q, Q/S = I₁/I₂ समीकरण 2.

समीकरण 1 व 2 से, R/P = Q/S या P/Q = R/S सिध्द है।

यह व्हीटस्टोन सेतु की संतुलन अवस्था की शर्त थी, इस प्रकार प्रतिरोध P तथा Q का अनुपात तथा प्रतिरोध R का मान ज्ञात होने पर अज्ञात प्रतिरोध S का मान ज्ञात किया जा सकता है।

अनुप्रयोग:

व्हीटस्टोन सेतु का उपयोग विद्युत प्रतिरोधों की बहुत सटीक माप के लिए किया जाता है, जिसे विज्ञान और इंजीनियरिंग के कई क्षेत्रों में लागू किया जाता है। यह सेंसरों की कैलिब्रेशन, मटेरियल की इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज की जांच, और विद्युतीय सर्किटों की डिज़ाइन और परीक्षण में उपयोगी होता है।